सोचा था घर छूटा तो क्या इतना बड़ा जहाँ तो है
पर मेरे छोटे घर से भी छोटा ये जहाँ हो गया
छूटा उसका साथ तो हर साथ कम पड़ने लगा
मै भरी दुनिया के रहते कितना तन्हा हो गया
शायद किसीके प्यार के काबिल नही रहे है हम
जिससे भी सोची प्यार की वो ही खुदा हो गया
वो थी घर था हक से मिलती थी कभी रोटी हमें
पर अब कटोरा भीख का थाली की जगह हो गया
हसरत भरी नजरों से अब तो देखता हूँ रोटियाँ
मै दरबदर भटकते भिखारी की निगाह हो गया
जिस भी दिये से मैने घर मे रोशनी की सोच ली
वही चान्द सूरज बनके किसी आसमाँ का हो गया
चान्द से है लाख बेहतर,माटी का वो नन्हा दिया
जिस दिये से घर किसी मुफलिस का रोशन हो गया
कोई लाख सुन्दर हो सलौना हो किसीसे हमको क्या
दिये से घर रोशन तो था चान्द तुझ से क्या मिला
Sunday, March 9, 2008
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6 comments:
achcha likha hai aapne....aapka comment maine apne blog par padha!aap mere prashaasnik anubhav 'chokher bali' blog par jaakar padh sakte hain.
" thankyou sir,for visiting my blog, and dropping your so precious and valuable comments on my poetry"
Regards
"pyar mrgtreshna hee nahee, ek bdda he hseen dhokha hai,
hum dunteyn hai jis panee ko, vo humaree ankhon mey aansuon ka srotta hai"
iska har sher khoobsurt hai
धन्यवाद...आपने मेरी ग़ज़लों को पसंद किया! मैंने उर्दू कहीं नहीं सीखी है बल्कि मुझे उर्दू बहुत कम आती है!अभी कुछ दिन पहले मैंने हिंदी-उर्दू डिक्शनरी खरीदी है उसी में से देख लेती हूँ अर्थ!
Sundar Likhaa
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