Tuesday, November 24, 2009

Sunday, March 9, 2008

जिससे भी सोची प्यार की

सोचा था घर छूटा तो क्या इतना बड़ा जहाँ तो है
पर मेरे छोटे घर से भी छोटा ये जहाँ हो गया

छूटा उसका साथ तो हर साथ कम पड़ने लगा
मै भरी दुनिया के रहते कितना तन्हा हो गया

शायद किसीके प्यार के काबिल नही रहे है हम
जिससे भी सोची प्यार की वो ही खुदा हो गया

वो थी घर था हक से मिलती थी कभी रोटी हमें
पर अब कटोरा भीख का थाली की जगह हो गया

हसरत भरी नजरों से अब तो देखता हूँ रोटियाँ
मै दरबदर भटकते भिखारी की निगाह हो गया

जिस भी दिये से मैने घर मे रोशनी की सोच ली
वही चान्द सूरज बनके किसी आसमाँ का हो गया

चान्द से है लाख बेहतर,माटी का वो नन्हा दिया
जिस दिये से घर किसी मुफलिस का रोशन हो गया

कोई लाख सुन्दर हो सलौना हो किसीसे हमको क्या
दिये से घर रोशन तो था चान्द तुझ से क्या मिला

Thursday, March 6, 2008

तेरी सुन्दरता

चान्द बोला मुझसा सुन्दर है कोई दूजा बता
मुझसे मिलती है धरा को चान्दनी जैसी छटा

तारे बोले हमसा सुन्दर है कहाँ कोई दूसरा
तारों भरे आकाश से सुन्दर नजारा और क्या
फूल बोले हम हैं सुन्दर हम से महका ये जहाँ
बोला गुलाब मुझसा रंग रूप ढूंढ के तो ला

तब मेरा मन कल्पना की वो उडान भर गया
चान्द से भी सुन्दर चेहरे का तसुव्वर कर गया
गुलाब से भी शोख रंग रूप उसका सोच डाला
आँखे गहरी झील सी जो उतरा बस उतर गया

नयना कजरारे मिले तो इतने कजरारे मिले
नयनों में काजल लगा तो और काला पड गया
जुल्फें इतनी रेशमी ढूंढी कि सर पे जब कभी
डाला दुपटटा बाद मे पहले नीचे उतर गया

माथे पे बिन्दी की जगह इक उगता सूरज धर दिया
होठों को दी मिठास वो जिसने चखा वो तर गया
देखते ही देखते लाजवाब सूरत बन गयी
चेहरे पे नूर इतना कि सूरज भी फीका पड गया

इस इरादे से कि हर शै से वो सुन्दर बने
सारे जहाँ की सुन्दरता इक चेहरे में ही भर गया
मैं तो अपनी सोच में कुछ और था बना रहा
मुझ को क्या खबर थी तेरा अक्स है उभर रहा

बस अब धडकने के लिये इक दिल की ही तलाश थी
उस जगह पे मैने अपने दिल का टुकडा धर दिया
देख के सूरत तेरी चान्द भी शरमा गया
और गुलाब के भी माथे पर पसीना आ गया

रंग रूप देख तेरा मेनका घबरा गयी
स्वर्ग की ये अप्सरा धरती पे कैसे आ गई
बदनसीबी क्या है और होती है खुशनसीबी क्या
देखते ही तुझको मुझे बात समझ आ गई
बदनसीब वो है तू जिससे भी दूर हो गई
खुशनसीब है वो तूँ जिसके भी पास आ गई

Wednesday, March 5, 2008

मृगतृष्णा

किसी और का कोई दोष नही, बस मेरी ही नादानी है
जाने मै कैसे भूल गया मेरा सफर तो रेगिस्तानी है

इन रेतीली राहो में सदा सूरज को दहकता मिलना है
बून्दों के लिये यहाँ आसमान को तकना भी बेमानी है

बादल के बरसने की जाने उम्मीद क्यों मेरे मन में जगी
यहां तो बदली का दिखना भी , खुदा की मेहरबानी है

यहाँ रेत के दरिया बहता हैं कोई प्यास बुझाएगा कैसे
प्यासे से पूछो मरूथल में किस हद तक दुर्लभ पानी है

यहाँ बचा बचा के रखते हैँ सब अपने अपने पानी को
यहाँ काम वही आता है जो अपनी बोतल का पानी है

पानी पानी चिल्लाने से यहाँ कोई नहीं देता पानी
प्यासा ही रहना सीख अगर तुझे अपनी जान बचानी है

मृगतृष्णा के पीछे दोड़ा तो दौड़ दौड़ मर जायेगा
पानी तो वहाँ मिलना ही नही, बस अपनी जान गंवानी है

इसे प्यासे की मजबूरी कहूँ या चाह कहूँ दीवाने की
वो जानता है मृगतृष्णा है पर मानता है कि पानी है

फिर इस में तेरा दोष कहाँ , मेरी ही तो नादानी है
तुम भी तो थी मृगतृष्णा ही मैनें समझा कि पानी है