Thursday, March 6, 2008

तेरी सुन्दरता

चान्द बोला मुझसा सुन्दर है कोई दूजा बता
मुझसे मिलती है धरा को चान्दनी जैसी छटा

तारे बोले हमसा सुन्दर है कहाँ कोई दूसरा
तारों भरे आकाश से सुन्दर नजारा और क्या
फूल बोले हम हैं सुन्दर हम से महका ये जहाँ
बोला गुलाब मुझसा रंग रूप ढूंढ के तो ला

तब मेरा मन कल्पना की वो उडान भर गया
चान्द से भी सुन्दर चेहरे का तसुव्वर कर गया
गुलाब से भी शोख रंग रूप उसका सोच डाला
आँखे गहरी झील सी जो उतरा बस उतर गया

नयना कजरारे मिले तो इतने कजरारे मिले
नयनों में काजल लगा तो और काला पड गया
जुल्फें इतनी रेशमी ढूंढी कि सर पे जब कभी
डाला दुपटटा बाद मे पहले नीचे उतर गया

माथे पे बिन्दी की जगह इक उगता सूरज धर दिया
होठों को दी मिठास वो जिसने चखा वो तर गया
देखते ही देखते लाजवाब सूरत बन गयी
चेहरे पे नूर इतना कि सूरज भी फीका पड गया

इस इरादे से कि हर शै से वो सुन्दर बने
सारे जहाँ की सुन्दरता इक चेहरे में ही भर गया
मैं तो अपनी सोच में कुछ और था बना रहा
मुझ को क्या खबर थी तेरा अक्स है उभर रहा

बस अब धडकने के लिये इक दिल की ही तलाश थी
उस जगह पे मैने अपने दिल का टुकडा धर दिया
देख के सूरत तेरी चान्द भी शरमा गया
और गुलाब के भी माथे पर पसीना आ गया

रंग रूप देख तेरा मेनका घबरा गयी
स्वर्ग की ये अप्सरा धरती पे कैसे आ गई
बदनसीबी क्या है और होती है खुशनसीबी क्या
देखते ही तुझको मुझे बात समझ आ गई
बदनसीब वो है तू जिससे भी दूर हो गई
खुशनसीब है वो तूँ जिसके भी पास आ गई

2 comments:

seema gupta said...

इस इरादे से कि हर शै से वो सुन्दर बने
सारे जहाँ की सुन्दरता इक चेहरे में ही भर गया
मैं तो अपनी सोच में कुछ और था बना रहा
मुझ को क्या खबर थी तेरा अक्स है उभर रहा
" marvelleous"

Daisy said...

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