Sunday, March 9, 2008

जिससे भी सोची प्यार की

सोचा था घर छूटा तो क्या इतना बड़ा जहाँ तो है
पर मेरे छोटे घर से भी छोटा ये जहाँ हो गया

छूटा उसका साथ तो हर साथ कम पड़ने लगा
मै भरी दुनिया के रहते कितना तन्हा हो गया

शायद किसीके प्यार के काबिल नही रहे है हम
जिससे भी सोची प्यार की वो ही खुदा हो गया

वो थी घर था हक से मिलती थी कभी रोटी हमें
पर अब कटोरा भीख का थाली की जगह हो गया

हसरत भरी नजरों से अब तो देखता हूँ रोटियाँ
मै दरबदर भटकते भिखारी की निगाह हो गया

जिस भी दिये से मैने घर मे रोशनी की सोच ली
वही चान्द सूरज बनके किसी आसमाँ का हो गया

चान्द से है लाख बेहतर,माटी का वो नन्हा दिया
जिस दिये से घर किसी मुफलिस का रोशन हो गया

कोई लाख सुन्दर हो सलौना हो किसीसे हमको क्या
दिये से घर रोशन तो था चान्द तुझ से क्या मिला

6 comments:

pallavi trivedi said...

achcha likha hai aapne....aapka comment maine apne blog par padha!aap mere prashaasnik anubhav 'chokher bali' blog par jaakar padh sakte hain.

seema gupta said...

" thankyou sir,for visiting my blog, and dropping your so precious and valuable comments on my poetry"

Regards

"pyar mrgtreshna hee nahee, ek bdda he hseen dhokha hai,
hum dunteyn hai jis panee ko, vo humaree ankhon mey aansuon ka srotta hai"

Anonymous said...

iska har sher khoobsurt hai

pallavi trivedi said...

धन्यवाद...आपने मेरी ग़ज़लों को पसंद किया! मैंने उर्दू कहीं नहीं सीखी है बल्कि मुझे उर्दू बहुत कम आती है!अभी कुछ दिन पहले मैंने हिंदी-उर्दू डिक्शनरी खरीदी है उसी में से देख लेती हूँ अर्थ!

आशीष कुमार 'अंशु' said...

Sundar Likhaa

Daisy said...

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